सफलता पर विजय – सफलता और आनंद का अनोखा संगम

//सफलता पर विजय – सफलता और आनंद का अनोखा संगम

आनंद हमारे भीतर है

जीवन में हर पल हम ख़ुशी की तलाश करते हैं| जब हमारे पास धन होता है तो हम खुश होते हैं| जब हमारे पास पद होता है तो हम खुश होते हैं| जब हम सफल होते हैं तो हम खुश होते हैं| जब हमें सम्मान मिलता है, तो हम खुश होते हैं| सामान्यत: हमारी हर ख़ुशी के पीछे कोई न कोई कारण होता है|

दूसरी ओर, अगर हम याद करें अपना बचपन, तब हमारे पास न धन था, न कोई पद था, न सम्मान था, न सफलता थी; ऐसा कुछ भी नहीं था जिसके कारण हम आज खुश होते हैं| वास्तव में, हम हर छोटी से छोटी चीज के लिए अपने माँ-बाप पर, अपने अध्यापकों पर और अपने से बड़ों पर निर्भर थे| हर छोटे से छोटे काम के लिए हमें उनसे आज्ञा लेनी होती थी| वास्तव में, उनकी आज्ञा के बिना हम कुछ भी तो नहीं कर सकते थे| परन्तु तब भी हम खुश थे| अगर हम अपने जीवन में खोजें, तो अधिकतर लोगों का अनुभव है कि हमारे जीवन का सबसे खुशहाल समय हमारा बचपन था| आश्चर्य की बात है कि बचपन में हमारे पास कोई भी तो कारण नहीं था खुश होने का, फिर भी हम सबसे ज्यादा खुश थे|

इसका तो अर्थ यह हुआ कि हम किसी ऐसी खुशी से परिचित थे, जो किसी भी कारण पर निर्भर नहीं थी| जिसके लिए न धन कि आवश्यकता थी, न पद की, न प्रतिष्ठा की, न सम्मान की, न सफलता की और न ही किसी और कारण की|

ख़ुशी कहीं हमारे भीतर से ही आ रही थी| संतों ने इस ख़ुशी को आनंद कहा है| आनंद अर्थात अकारण ख़ुशी; एक ऐसी ख़ुशी जिसके पीछे कोई कारण नहीं| आनंद हमारे भीतर है| आनंद हमारा स्वभाव है|

जब हमारा ध्यान, हमारी चेतना स्वयं में स्थित होती है तो हम आनंद का अनुभव करते है, शांति का अनुभव करते हैं|

सफलता हमारे बाहर है

हमारी मौलिक आवश्यकता है आत्मनिर्भरता|

जैसे जैसे हम बड़े होते हैं हमें आर्थिक, शारीरिक और मानसिक रूप से आत्मनिर्भर बनना है| स्वयं को आजीविका कमाने के लिए तैयार करना है| अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए हमें अपने पैरों पर खड़े होना है| हमें जीवन के हर क्षेत्र में सफल होना है| धन, पद, मान, प्रतिष्ठा हासिल करनी है, जिसके लिए संसार की दौड़ शुरू होती है| ४-५ वर्ष की उम्र आते आते हम स्कूल जाना शुरू कर देते हैं| और फिर कॉलेज फिर यूनिवर्सिटी, व्यवसाय आदि की दौड़ में जिंदगी भागने लगती है| अथक प्रयास और कठोर परिश्रम के पश्चात, हम सफल हो जाते हैं| हम वह सब पा लेते हैं जो हमने चाहा था| धन कमा लेते हैं, पद और प्रतिष्ठा हांसिल कर लेते है, बड़ा मकान बना लेते हैं, सुन्दर गाडी खरीद लेते हैं| यानी सभी सुख सिविधाओं का आयोजन कर लेते हैं, आत्म्निभर बन जाने हैं और सफल हो जाते हैं|

जिन्दगी में सफल होने के लिए, आत्मनिर्भर बनने के लिए, हमारी उर्जा, हमारे ध्यान, हमारी चेतना को स्वयं से बाहर, संसार की यात्रा करनी होती है| और जितना ज्यादा हमारी चेतना संसार में जायेगी, हम उतना ही सफल हो पायेंगे|

चेतना की दो दिशायें

यानी जब हमें सफल होना है तो हमारी चेतना को बाहर संसार में जाना होगा और जब हमें आनंद और शांति में डूबना है तो हमारी चेतना को स्वयं के भीतर आना होगा| आनंद बाहर नहीं है और सफलता भीतर नहीं है|

सफलता और आनंद में चुनाव संभव नहीं है| जीवन में सफलता और आनंद, दिन और रात के समान हैं| काम करने के लिए, आजीविका कमाने के लिए, मेहनत करने के लिए हमें दिन भी चाहिए और विश्राम करने के लिए, नींद के लिए हमें रात भी चाहिए| जिस प्रकार रात का विश्राम हमे अगले दिन काम करने की शक्ति देता है| उसी प्रकार जब हम आनंद और शान्ति में डूबते हैं, तो हम सफलता की यात्रा के लिए शक्ति एकत्रित कर पाते हैं|

कल्पना करें कि अगर हमारे जीवन में सिर्फ आनंद और शांति ही हो और हम सफल न हों, आत्मनिर्भर न हों, तो ऐसी जिन्दगी भी अधूरी होगी| और अगर हमारी जिन्दगी में सिर्फ सफलता हो, धन के अम्बार लगे हों, परन्तु शांति और आनंद न हो, तो ऎसी जिन्दगी भी अधूरी होगी|

जीवन में सफलता और आनंद, दोनों का बराबर महत्व है|

इसके लिए आवश्यक है कि हमारी चेतना की यात्रा सरल और सुगम हो| जितनी सुगमता से हमारी चेतना संसार में जाए सफलता और आत्मनिर्भरता के लिए; उतनी ही सुगमता से हमारी चेतना स्वयं के भीतर आ पाए आनंद और शांति के लिए| तभी हम जीवन में सफलता और आनंद, दोनों को अनुभव कर सकते है| हमारी चेतना की यात्रा उतनी ही सुगम हो जितनी सुगमता से सुबह हम आपने घर से अपने कार्यस्थल पर जाते है, और उतनी ही सुगमता से शाम को हम अपने घर भी वापस आ जाते हैं| इसी प्रकार, जब आवश्यकता हो तो हमारी चेतना इतनी ही सुगमता से संसार में जा सके और जब आवश्यकता हो तो उतनी ही सुगमता से स्वयं के भीतर आनंद में आ सके|

चेतना के मार्ग में अटकाव

हमारे जीवन में जहाँ पीड़ा है, चिंता है, परेशानी है या तनाव है; वहाँ हमारा ध्यान, हमारी चेतना अटक जाती है| अपने अनुभव से समझने की कोशिश करते हैं| हमें सामान्यत: अपने शारीर का बोध नहीं होता| हमें अपने सिर का पता तब चलता है जब सिर में दर्द होता है, अन्यथा हमारा ध्यान सिर की ओर नहीं जाता| उसी प्रकार हमें अपने पेट का पता तभी चलता है जब भूख लगी हो अथवा ज्यादा भरा हो, अन्यथा हमें अपने पेट का बोध ही नहीं होता|

अतः जहाँ पीड़ा है, चिंता है, तनाव है, परेशानी है वहीँ हमारा ध्यान, हमारी चेतना अटक जाती है| जिस वजह से हमारी चेतना स्वयं के भीतर नहीं पहुँच पाती और आनंद को, जो कि हमारा स्वाभाव है, जो कि हमारे भीतर है, अनुभव नहीं कर पाती|

हमने ऊपर जाना कि जीवन में सफलता और आनंद दोनों आवश्यक है जिसके लिए हमारी चेतना को सुगमता से भीतर और बाहर की यात्रा करनी होती है|

पहला अटकाव – संसार

जब चेतना बाहर से भीतर की ओर यात्रा करती है तो पहला पड़ाव है संसार के लोग| यानी हमारा परिवार, हमारे प्रियजन, हमारे मित्र, हमारे पडोसी, हमारे सहपाठी या सहकर्मी| यही हमारा समाज है, यही हमारा संसार है| यदि हमारे सम्बन्ध इनके साथ मधुर हैं तो हमारी चेतना सुगमता से इसको पार करके और भीतर चली जाती है| किन्तु अगर हमारे सम्बन्ध कटु हैं तो यह हमारी चेतना के लिए पहला अटकाव है|

आज ज्यादातर संबंधों से मधुरता लुप्त हो गई है — चाहे वह पति-पत्नी के सम्बन्ध हो, पिता-पुत्र के सम्बन्ध हों या अपने सहकर्मियों के साथ हों| हमारा सारा ध्यान, हमारी सारी चेतना वहां अटक कर रह जाती है| और इस कारण भीतर की यात्रा पर नहीं जा पाती|

दूसरा अटकाव – शरीर

जब चेतना और भीतर की ओर यात्रा करती है तो अगला पड़ाव है हमारा शरीर| यदि हमारा शरीर स्वस्थ है, कोई तकलीफ नहीं है तो चेतना सुगमता से शरीर के पार चली जाती है| किन्तु यदि हमारा शरीर अस्वस्थ है, कहीं दर्द है, भारीपन है, पीड़ा है तो यह हमारी चेतना के लिए दूसरा अटकाव है|

आज सफल होने की दौड़ में हम अपने शरीर पर ध्यान नहीं दे पाते और बहुत कम उम्र में ही हम बिमार पड़ जाते हैं| फिर हमारा सारा ध्यान, हमारी चेतना हमारे शरीर पर ही अटक कर रह जाती है| जिसके कारण हमारी चेतना भीतर की यात्रा नहीं कर पाती|

तीसरा अटकाव – हमारे विचार

जब चेतना और भीतर की ओर यात्रा करती है तो अगला पड़ाव है हमारी बुद्धि| हमारी बुद्धि का काम है विचार करना, सही और गलत में भेद करना, ऐसे निर्णय लेना जो हमें सफलता के मार्ग पर अग्रसर करें| सफल होने का अर्थ है निर्णय लेना| हम जितने ज्यादा निर्णय लेते हैं, उतने ही सफल होते है| अगर हमारे निर्णय लेते समय कोई चिंता नहीं है तो हमारी चेतना सुगमता से और भीतर की यात्रा पर चली जाती है| परन्तु यदि हमें कोई चिंता है, तनाव है, सही और गलत का निर्णय नहीं कर पाते तो यह हमारी चेतना के लिए तीसरा अटकाव है|

आज का मनुष्य औरों से आगे निकलने की प्रतिस्पर्धा के कारण तनावग्रस्त है, चिंतित है, परेशान है| सारा दिन हम सोचते रहते हैं कि क्या करें, क्या न करें| इसके कारण चेतना हमारे विचारों पर अटक कर रह जाती है और भीतर की यात्रा नहीं कर पाती|

चौथा अटकाव – हमारी भावनायें

जब चेतना और भीतर की और यात्रा करती है तो अगला पड़ाव है हमारा हृदय| हमारा हृदय जहां हमारी सारी भावनाएं है, हमारे सारे अनुभव है, हमारे सारे भय है| अगर हमारा हृदय प्रेमल है, भयमुक्त है तो हमारी चेतना सुगमता से और भीतर की यात्रा पर चली जाती है| परन्तु यदि हम भय से ग्रस्त है तो यह हमारी चेतना के लिए चौथा अटकाव है|

आज बहुत से लोगों का हृदय भय से ग्रस्त है| ऐसी बहुत सी यादों से भरा है जिसको वह चाह कर भी भुला नहीं पाता| वे बुरी यादें, दुखद अनुभव उसकी चेतना को अटका कर रखते हैं और जैसे जैसे हमारी उम्र बडती है, हमारे दुखों का पहाड़ भारी और भारी होता जाता है तथा हमारी चेतना और भीतर की यात्रा नहीं कर पाती|

 

 

चेतना की मंजिल – आत्मा 

चेतना की मंजिल है अपनी आत्मा| जब हमारी चेतना अपनी आत्मा में डूब पाती है, अपने स्वयं में आ पाती है तभी वह विश्राम कर पाती है, आनंद और शांति अनुभव कर पाती है| यह तभी संभव है जब चेतना सभी पडावों को पार कर सके और सभी अट्कावों से मुक्त हो सके|

जब यह वापसी का मार्ग सुगम हो जाता है तो जब चाहे हमारी चेतना संसार में जा सकती है और जब चाहे वापस अपने स्वयं में आ सकती है| यानी हम सफलता और आनंद दोनों को प्राप्त कर सकते है|

आज की वास्तविकता – सफलता महँगी कीमत पर

अथक प्रयास और कठिन परिश्रम से हम सफल तो हो जाते हैं, परन्तु दुर्भाग्यवश, सफलता को पाने की दौड़ में हम पाते हैं कि हमारा स्वास्थ, हमारा परिवार, हमारे प्रियजन, हमारे मित्र, हमारा आनंद, हमारी ख़ुशी, हमारी शांति – सब पीछे कहीं दूर छूट गए| हम सफल तो हुए परन्तु साथ ही हम तनाव, अशांति, चिंता, अवसाद और रोगों से घिर गए; हम सफल तो हुए परन्तु हमारे परिवार और प्रियजनों के साथ हमारे सम्बन्ध कटु हो गये; हम सफल तो हुए परन्तु आनंद, शांति, और उत्सव से दूर हो गए| अब हमें खुश होने के लिए भी किन्ही कारणों की आवश्यकता पड़ती है|

यह सफलता हमें मिली हमारे स्वास्थ्य की कीमत पर, हमारे संबंधो की कीमत पर, हमारे आनंद की कीमत पर| हम सफल तो हुए परन्तु इस सफलता के लिए हमने बहुत बड़ी कीमत चुकाई| यह सफलता सस्ती नहीं है| और अगर सफलता के लिए हमें यह कीमत चुकानी पड़े, तो प्रश्न उठता है, “क्या हम वास्तव में सफल हुए”?

सफलता पर विजय

अगर थोडा भी विवेकपूर्ण विचार करेंगे तो न तो इतनी महंगी सफलता हम स्वयं के लिए चाहेंगे और न ही अपने बच्चों और प्रियजनों के लिए| हमें सफल तो होना है, परन्तु हम इस सफलता के लिए इतनी बड़ी कीमत चुकाने को बिलकुल भी राजी नहीं है|

अगर हमें सफलता अपने स्वास्थय, संबंधो, आनंद और शांति की कीमत पर मिले तो सफलता हम पर विजयी हो गई| और अगर हम बिना इस कीमत के सफल होते हैं, तभी हम कह सकते हैं कि हमने सफलता पर विजय हांसिल की|

क्या सफलता पर विजय संभव है?

तो प्रश्न उठता है कि क्या सफलता पर विजय संभव है? क्या हम ऐसा जीवन जी सकते है जिसमें हम सफल भी हों, जीवन में सभी सुख सुविधायें हों और साथ ही हमारे सम्बन्ध मधुर हों, शरीर स्वस्थ हो, बुद्धि तीक्षण हो, ह्रदय प्रेमल हो और चेतना ध्यानस्थ हो|

जी हाँ, जीवन में “सफलता पर विजय” संभव है| और यह मैं अपने अनुभव के आधार पर कह सकता हूँ|

परमात्मा के आशीर्वाद से और अपने सदगुरुओं की कृपा से, इस जीवन की पाठशाला में जो मैंने सीखा और अनुभव कर खरा पाया, उसके आधार पर मैंने “सफलता पर विजय” नामक 6 दिवसीय ट्रेनिंग कार्यक्रम बनाया है|

यदि आप अपने जीवन में सफलता पर विजय हांसिल करना चाहते हैं, अथवा अपने बच्चों को एक बेहतर भविष्य देना चाहते हैं, तो मैं आपको “सफलता पर विजय” नामक ट्रेनिंग के लिए प्रेमपूर्ण आमंत्रण देता हूँ| और विशवास दिलाता हूँ कि यह 6 दिन आपके जीवन को रूपांतरित कर देंगे|

यदि किसी मित्र के कोई प्रश्न हैं तो मुझे संपर्क कर सकते हैं,

डॉ. पंकज गुप्ता

 

2018-09-20T11:25:29+00:00

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