छात्रों की बढती आत्महत्याएँ: अभिभावक कितने जिम्मेवार

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26 जुलाई 2018, दिल्ली के पीतमपुरा इलाके में गुरुवार को सुबह 11: 30 बजे VIPS कॉलेज की सातवीं मंजिल से कूदकर वरीशा नाम की लड़की ने खुदकुशी कर ली। वरीशा ने LLB की थी और यहां LLM के लिए अप्लाई किया था|
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जुलाई 2018, कॉलेज के शौचालय में छात्रा ने आत्महत्या की, पुलिस ने शुरू की जांच|
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जुलाई 2018: नौवीं कक्षा के छात्र ने हॉस्टल में की खुदकुशी, पिता ने जताई साजिश की आशंका।
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जून 2018: मध्यप्रदेश में रैगिंग से परेशान एमबीबीएस छात्र ने फांसी लगाकर जान दी|
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मई 2018: सीबीएसई क्लास 10 रिजल्ट: खराब रिजल्ट आने से निराश 2 छात्रों ने की खुदकुशी|

आज अखबार इस तरह के दुखद समाचारों से भरे पड़े हैं। आज भारत वर्ष में हर 55 मिनट में एक छात्र आत्महत्या कर रहा है। सरकारी आंकड़े बताते हैं कि सन् 2007 से 2016 तक लगभग 75,000 छात्रों ने आत्महत्या की है। प्रतिवर्ष आत्महत्या करने वाले छात्रों की संख्या बढ़ रही हैं। 2014 में 8060 छात्रों ने आत्महत्या की थी; 2015 में संख्या बढ़ कर 8934 हो गयी और वर्ष 2016 में 9474 छात्रों ने आत्महत्या की। यानी हर 55 मिनट में भारत में एक छात्र आत्महत्या कर रहा है। जब मैं इस तरह के समाचार सुनता हूं तो मुझे बहुत दुख होता है| मैंने इस विषय पर बहुत सोचा की बच्चे आत्महत्या क्यों कर रहे हैं, और क्या किया जा सकता है अपने बच्चों को आत्महत्या से रोकने के लिए| समस्या इतनी गंभीर और विकराल है कि कोई भी माता-पता पूर्ण विशवास से नहीं कह सकता कि कल उसका बच्चा आत्महत्या नहीं करेगा; क्यूंकि जो बच्चा आज आत्महत्या कर रहा है, उसके अभिभावक भी बच्चे की इस भावना से अनजान हैं|

छात्रों की आत्महत्या का सबसे बड़ा कारण उनके माता-पिता हैं| और वह इसलिए क्योंकि जब एक बच्चा आत्महत्या करता है तो सबसे ज्यादा अगर कोई दुखी होता है तो वह हैं उसके माता-पिता। बाकी लोगों के लिए यह एक आंकड़ा है; एक समाचार है; उससे जादा कुछ नहीं| मैं नहीं जानता कि छात्रों की आत्महत्या में स्कूल/ कॉलेज जिम्मेवार हैं या नहीं; सरकार जिम्मेवार है या नहीं; सिक्षा पद्धति जिम्मेवार है या नहीं| मैं सिर्फ इतना जानता हूँ कि कोई भी माता-पिता इतना शक्तिशाली नहीं कि वह समाज व्यवस्था को बदल सके और न ही इतना शक्तिशाली है कि अपने जवान बच्चे की लाश तो अपने कंधे पर उठा सके| परन्तु हर माता-पिता इतना सक्षम अवश्य हैं कि वह अपने बच्चों की परवरिश में यथासंभव सुधार ला सकें ताकि वे अपने बच्चे को आत्महत्या से बचा सकें|

समाचारों से ऐसा लगता है कि जो बच्चे अपने जीवन में असफल हो जाते हैं, वही आत्महत्या करते हैं| थोड़ा गहराई से देखने की कोशिश करते हैं| किसी भी कंपटीशन एग्जाम में, चाहे वह इंजीनियरिंग हो, मेडिकल हो, सिविल सर्विसेस हो अथवा कोई और, सफल बच्चों कि संख्या 8% से 10% ही होती है| उदहारण के लिए अगर मेडिकल में लगभग 6 लाख बच्चे बैठते हैं तो सिर्फ लगभग 52 हजार सीटें ही हैं-  यानी 8% बच्चे ही सफल हो सकते हैं| और सभी परीक्षाओं की भी लगभग यही हालत है। यानी सभी कम्पटीशन एग्जाम में कुल मिलाकर 25% से 30%  बच्चे ही सफल हो सकते हैं— अर्थात 70% बच्चे तो हर हाल में असफल होंगे| लेकिन ख़ुशी कि बात यह है कि सभी 70% बच्चे, जो असफल हुए, वे आत्महत्या नहीं कर रहे| इसका अर्थ यह हुआ कि हो सकता है असफलता भी एक कारण हो परंतु उससे बड़े कुछ और कारण भी हैं|

मुझे जो सबसे बड़ा कारण नजर आता है, वह है बच्चों और उनके माता-पिता के बीच बिगड़ते संबंध| मैं एक काउंसलर हूँ और जब मेरे पास माता-पिता अपने बच्चे की काउंसलिंग के लिए आते हैं तो लगभग सभी का कहना होता है कि हम अपने बच्चों को बहुत प्यार करते हैं, परन्तु बच्चे हमारी बात नहीं मानते, हमारी इज्ज़त नहीं करते| आज की तो जनरेशन ही बिगड़ी हुई है| जैसा मैंने कहा कि मैं एक काउंसलर हूँ, स्कूल और कॉलेज में बच्चों को ट्रेनिंग देता हूँ और मोटिवेशनल स्पीकर हूँ; अतः मुझे बच्चों के साथ रहने का और उनसे रूबरू बात करने का अवसर मिलता है| आइए हम एक बच्चे की नजर से देखते हैं कि वह अपने मां-बाप के प्यार को किस तरह से महसूस करता हैं:

  • ग्यारहवीं कक्षा के एक छात्र का कहना है कि हमारे माता-पिता हमें प्यार नहीं करते| वे जो हम पर पैसा खर्च करते हैं, पढ़ाई में, ट्यूशन इत्यादि में, वह अपने अहंकार की पुष्टि के लिए करते हैं| वे चाहते हैं कि हम सफल हो ताकि वे अपने दोस्तों और रिश्तेदारों में सीना ठोक कर कह सकें कि हमने अपने बच्चों को इंजीनियर बना दिया|
  • वही एक दूसरे छात्र का कहना है कि मेरे पापा कहते हैं चाहे कुछ भी हो जाए तुम्हें 12वीं में हर हाल में 95% से ज्यादा नंबर लाने हैं; क्योंकि तुमने देखा, तुम्हारे ताऊ की बेटी पिछले साल 6% नंबर लाइ थी, अब तुम्हारे अगर 95% से कम नंबर आये तो मेरी नाक कट जाएगी।
  • पापा मुझसे बात नहीं करते| उन्होंने कहा है जब तक इंजीनियरिंग में एडमिशन नहीं हो जाता तब तक वह मुझसे बात नहीं करेंगे|
  • जब हम 4 घंटे लगातार पड़ते हैं, तो हमारे माता-पिता की नजर हम पर नहीं जाती| परंतु जैसे ही हम TV चलाते हैं या मोबाइल हाथ में लेते हैं तभी वे लेक्चर देना शुरु कर देते हैं| क्या हम 24 घंटे पढ़ सकते हैं?
  • आप मेरे पापा को थोड़े दिन के लिए ले जाओ और उनको अच्छे पापा बना कर ले आओ|
  • मेरे माता-पिता ने आज तक मुझे कभी “बेटा” नहीं कहा, न कभी गले लगाया और न ही कभी शाबाशी दी|

ऐसी बहुत सी बातें है जो बच्चे अपने माता-पिता के विषय में मुझे बताते हैं| अगर आप ऐसा समझते हैं कि आप एक अपवाद हैं, आपके बच्चे आपसे खुश हैं; तो कृपया एक बार विचार करें कि क्या आपने उन्हें अपनी नाराजगी व्यक्त करने की स्वतंत्रता दी है| कल्पना करें कि यदि आपका बच्चा आपकी गलती निकालेगा तो क्या आप अपनी कमियों या गलतियों को सहर्ष स्वीकार कर पायेंगे? हर मां बाप अपने बच्चों में संस्कार डाल देते हैं कि बुरी बात नहीं करनी, किसी को बुरा नहीं कहन| माता-पिता की इज्ज़त करनी चाहिए| अर्थात यदि मेरा बच्चा अगर किसी बात से मुझसे नाराज है तो उसको वह नाराजगी व्यक्त करने का न अधिकार है और न ही माहोल| यह बात हर बच्चा बहुत अच्छे तरीके से समझता है| और माता-पिता इस गलतफहमी में रहते हैं कि हमारे बच्चे हमसे बहुत खुश हैं| और बदकिस्मती से यह गलतफहमी तब टूटती है जब बच्चे की आत्म्हत्या की खबर आती है|

कुछ बातों से समझते हैं कि माता-पिता अपने बच्चों की परवरिश में क्या गलतियां करते हैं|

  • अक्सर छोटे बच्चे अपने मां-बाप से बहुत सवाल पूछते हैं, अपनी ओर माता-पिता का ध्यान आकर्षित करना चाहते हैं| माता-पिता को लगता है कि बच्चा उनको परेशान कर रहा है| परेशानी से बचने के लिए सबसे आसान तरीका लगता है कि वह बच्चे को TV में कार्टून या मोबाइल दे देते हैं गेम्स खेलने के लिए| और यही मां-बाप बच्चों के बड़े होने पर शिकायत करते नजर आते हैं कि मेरा बच्चा सारा दिन टीवी और मोबाइल में लगा रहता है, हमारे साथ न बैठता है और न बात करता है| कौन हैं जिम्मेवार?
  • बहुत बार ऐसा देखा जाता है कि जब घर में सब लोग खाना खा चुके होते हैं उसके बाद बच्चा बोलता है मम्मी मुझे भूख लगी है या आज कुछ नया मजेदार बनाओ, और क्योंकि मां के पास समय नहीं है या वह अपने दिन के काम से थक गई है तो उनको कोल्ड ड्रिंक, चाकलेट, बिस्कुट या बाज़ार से कुछ मंगा कर खाने के लिए दे देती हैं| बाद में यही माता-पिता शिकायत करते हैं कि हमारे बच्चे बाहर का खाना खाते हैं और घर का खाना उन्हें पसंद नहीं है, जिसके कारण इनका वजन बढ़ता जा रहा है और स्वास्थ्य खराब हो रहा है| कौन हैं जिम्मेवार?
  • हम सिखाते हैं कि माता-पिता की इज्ज़त करनी चाहिए और अपने माता-पिता की इज्जत करना भूल जाते हैं| जब बच्चे अपने माता-पिता द्वारा अपने दादा-दादी का अपमान होता देखते हैं, तो वह भी यही करते हैं| और बाद में यही माता-पिता शिकायत करते हैं कि बच्चे उनकी इज्जत नहीं करते|कौन है जिम्मेवार?
  • हम अपने बच्चों को सिखाते हैं कि सब से प्यार करो परंतु यदि हमारा बच्चा कभी जमीन पर गिर जाता है या मेज, कुर्सी से टकरा जाता है तो हम उसको एक जोर का चांटा लगाते हैं और बच्चों को कहते हैं कि देखो हमने जमीन की पिटाई कर दी या कुर्सी को मार दिया| यानी हम उसे प्रेम करना नहीं अपितु बदला लेने कि भावना सिखा रहें हैं| कल को बच्चा यदि क्रोधी हो जाता है, तो कौन हैं जिम्मेवार?
  • जब माता-पिता छोटे बच्चों को क्रेच में या आया के भरोसे छोड़ कर पैसे कमाने जाते है तो बच्चे को सन्देश दे रहे हैं कि पैसा उससे ज्यादा मूल्यवान है| वही बच्चा अगर माता-पिता को वृधाश्रम में छोड़ आता है तो, कौन है जिम्मेवार?

ऐसे अनगिनित उदाहरण हैं जिनसे हम समझ सकते हैं कि माता-पिता बच्चों की परवरिश में क्या गलतियां करते हैं| जरा सोचिये, ज्यादातर माता-पिता संतान उत्पात्ति क्यों करते हैं? वंश चलाने के लिए; या सम्भोग का आनंद लेना शारीरिक आवश्यता है और उसके प्रतिफल के रूप में बच्चा पैदा हो जाता है| कितने माता-पिता ऐसे होंगे जो दिल पर हाथ रख कह सकते हैं कि वे माता-पिता बनना चाहते थे, एक दिव्यात्मा को आमंत्रित करना चाहते थे, उसके लिए पूर्णरूप से तैयार थे और माता-पिता बनने के लिए वे सम्भोग में उतरे|

हम यह भूल जाते हैं कि बच्चे को जन्म देने से कोई मनुष्य माता-पिता नहीं बनता, यह तो केवल एक पाशविक प्रक्रिया और उपलब्धि है| जानवर भी सम्भोग का आनंद लेने के फलस्वरूप, बच्चे पैदा कर देते हैं|

बच्चों की सही परवरिश करके ही एक मनुष्य सही मायने में माता-पता बनता है| बच्चे को पालना एक साधना है, एक तपस्या है जिसके लिए एक ऐसे अथाह धर्य की आवश्यकता है जो उस मूर्तिकार में होता है जो पत्थर पर एक कोमल आघात करता है, पर ध्यान रखता है कि कहीं मूर्ति का अहित न हो जाए| और इस धर्य से मूर्तिकार अपनी कल्पना को पराकाष्ठा तक ले जाता है और जन्म लेती है एक सजीव मूर्ति| बच्चों की परवरिश करना भी करीब १८ से २0 साल की लम्बी, अथक तपस्या है| तभी एक बच्चा अपने पैरों पर खड़ा हो पाता है|

हम जब भी कभी जीवन में कोई नया काम करते हैं; कोई नयी नौकरी या व्यवसाय करते हैं या जहाँ भी पैसा कमाने या खर्च करने का अवसर होता है; हम अनेक बार स्वयं का मूल्यांकन करते हैं कि क्या हम तैयार है या नहीं| और अगर नहीं, तो पूरी तैयारी करने के बाद, ट्रेनिंग के बाद ही व्यवसाय में धन या श्रम लगाते हैं | परन्तु दुर्भाग्यवश, हम अभिभावक बनने से पहले कोई तयारी नहीं करते| हम नहीं देखते कि क्या हम बच्चों की परवरिश के लिए पूर्णतया तैयार हैं अथवा किसी ट्रेनिंग कि आवश्यकता है| क्या हमारे पास बच्चे को देने के लिए पूरा समय है या नहीं| आज की तेज रफ़्तार जिंदगी में, जहाँ दोनों माता-पिता काम कर रहे हैं, पैदा होने के सिर्फ कुछ महीनों के पश्चात बच्चे को आया के हवाले या क्रेच में छोड़ जाते हैं| हम यह भूल जाते हैं कि उस आत्मा को हमने ही आमंत्रित किया है अपने शरीर के द्वारा जन्म लेने के लिए, अपने परिवार में आने के लिए| जरा सोचिये, आपको कोई अपने घर आमंत्रित करता है और आप मेहमान बनते है| और अगर वह थोड़ी देर में, चाय नाश्ता करा कर, चलता बने कि अब आपका ख्याल आया रहेगी तो क्या आप उस घर में कभी मेहमान बनना चाहेंगे? क्या आप इसे अपनी बेइज़्जाती नहीं समझेंगे? परन्तु हम अपने बच्चों के साथ यही करते हैं और जरा भी उनकी बेईज्ज़ती का ख्याल नहीं आता|

क्या हम माता-पिता बनने से पहले जानते हैं कि पैदा होने से लेकर 20 वर्ष की उम्र तक बच्चे की शाररिक, मानसिक और मनोवाज्ञानिक आवश्यकतायें हर 2 से 3 साल में बदल जाती हैं| अज्ञान वश हमारा परवरिश का तरीका बच्चों की आवश्यकता अनुसार नहीं होता| हमें लगता है कि हम बच्चों को प्यार  कर रहे हैं, परन्तु बच्चा हमारे उस व्यवहार से घुट रहा है, दुखी हो रहा है| फिर बच्चों के साथ सम्बन्ध खराब हो जाते हैं | नतीजा आत्म्हात्यें|

प्रेम के नाम पर हम अपना तनाव, अपनी अतृप्त इच्छायें, अपनी कामनायें सब बच्चों पर थोपते जाते हैं| उनकी इच्छाओं का कोई मूल्य नहीं| वास्तव में, हम अपने बचपन और जवानी की भूलों को अपने बच्चों के द्वारा सुधारना चाहते हैं| याद रहें, कि प्रेम के नाम पर हम जितनी हिंसा अपने बच्चों के साथ करते हैं, उतनी हिंसा तो संसार में दुश्मनी के नाम पर भी नहीं होती|

मेरा हर माता-पिता से करबद्ध निवेदन है कि एक अच्छे माता-पिता बनने के लिए स्वयं को पूर्ण रूप से तैयार करें, इस बात का निश्चय करें कि क्या वे अपने बच्चों की परवरिश के लिए 20 वर्ष की तपस्या के लिए तैयार हैं| और जब पायें कि वे तैयार हैं तभी एक दिव्यात्मा को अपने शरीर में आने का निमंत्रण दें| वरना आज ऐसे बहुत से गर्भनिरोध के सुलभ उपाय उपलब्ध हैं जिससे आप सम्भोग का भरपूर आनंद ले सकते हैं| माता-पिता बनने की कोई आवश्यकता नहीं है|

और यदि सभी माता-पता अच्छी परवरिश की ट्रेनिग लें; बच्चों की शारीरिक, मानसिक और मनोवाज्ञानिक आवश्यकताओं के अनुरूप (जो कि उम्र के साथ बदलती रहती है) व्यवहार करेंगे, तो आपके अपने बच्चों के साथ सम्बन्ध मधुर होंगे और मुझे विश्वास है कि फिर जीवन में कितनी भी असफलतायें सामने आये, कितनी भी प्रतिकूल परिस्थिति हो; आपके बच्चे पूर्णरूप में उनका सामना करेंगे और कभी भी आत्महत्या का विचार मन में नहीं लायेंगे|

मुझे जो ठीक लगता है, वह मैंने आपके साथ साझा किया| हो सकता है आप मेरे विचारों से सहमत न हों, परन्तु यह लेख एक प्रयास है कि आप सभी इस समस्या पर सोचने के लिए प्रेरित हों| मुझे पूरा विश्वास है कि यदि सभी मिल कर कोशिश करेंगे, तो हम अपने बच्चों को आत्महत्या रुपी राक्षस का ग्रास बन्ने से रोक पायेंगे और उन्हें एक खुशहाल भविष्य अवश्य दे पायेंगे|

अच्छे माता पिता कैसे बने, उसके लिए मेरा एक दिन का ट्रेनिग प्रोग्राम है जिसका नाम है “सनतराश”| इस ट्रेनिंग में नए पति पत्नी जो माता-पिता बनना चाह रहे हैं उनके लिए भी पूरा मार्गदर्शन है; और जो माता-पिता बन चुके हैं और अज्ञानवश बच्चों के साथ गलतियाँ कर चुके हैं उनके लिए भी मार्गदर्शन व सुधार करने के उपाए हैं| आप चाहें तो यह ट्रेनिंग कर सकते हैं | अगर आपके कोई प्रश्न है, तो आप मुझे संपर्क कर सकते हैं|

डॉ. पंकज गुप्ता

 

2018-09-20T11:23:20+00:00

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